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भारतीय शेयर बाज़ार में Power Shift: जब विदेशी निवेशक बेच रहे हैं, तब कौन खरीद रहा है?

पिछले कुछ सालों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार से जमकर पैसा निकाला है। इसके बावजूद बाज़ार गिरा नहीं, बल्कि नई ऊंचाइयों पर है। यह लेख इस अनोखे power shift के पीछे की कहानी और इसके गहरे मतलब को समझाता है।

भारतीय शेयर बाज़ार में Power Shift: जब विदेशी निवेशक बेच रहे हैं, तब कौन खरीद रहा है?

पिछले 25 सालों में ऐसा पहली बार हो रहा है। विदेशी निवेशक (Foreign Investors) भारतीय शेयर बाज़ार को छोड़कर जा रहे हैं, जैसे उन्हें कोई बड़ा खतरा महसूस हो रहा हो। साल 2025 में अब तक, विदेशी निवेशक $13 बिलियन (लगभग ₹1.16 लाख करोड़) से ज़्यादा की रकम निकाल चुके हैं और यह बिकवाली जारी है।

लेकिन यहाँ एक दिलचस्प मोड़ है: बाज़ार crash नहीं हुआ। बल्कि, यह फल-फूल रहा है और नए records बना रहा है।

यह एक ऐसे silent power shift का संकेत है जो भारतीय बाज़ारों को हमेशा के लिए बदल रहा है। आइए इस बदलाव की गहराइयों को समझते हैं।

वो दिन जब FII की एक खबर से बाज़ार हिल जाता था

2000 के दशक में, भारतीय बाज़ार विदेशी funds के इशारों पर नाचते थे। US Federal Reserve की एक press conference रातों-रात Sensex को गिरा सकती थी। लेकिन आज? विदेशी निवेशक भारत में अपनी हिस्सेदारी ऐसे बेच रहे हैं जैसे यह कोई जोखिम भरा सौदा हो, और फिर भी बाज़ार नई ऊंचाइयों को छू रहा है।

तो आखिर बदला क्या है?

पहले कुछ आंकड़ों पर नज़र डालते हैं:

  • $13 बिलियन: 2025 में अब तक विदेशी पूंजी की निकासी।
  • बिकवाली का दौर: पिछले कुछ सालों में विदेशी निवेश में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया है, जिसमें कई बार बड़ी बिकवाली हुई है।
  • एक दशक का निचला स्तर: भारतीय शेयरों में विदेशी ownership (हिस्सेदारी) एक दशक से भी ज़्यादा के सबसे निचले स्तर पर है।

संक्षेप में, भारत global portfolio में एक “consensus sell” बन गया है।

अगर विदेशी बेच रहे हैं… तो खरीद कौन रहा है?

अगर FIIs (Foreign Institutional Investors) चले गए हैं, तो खरीदार कौन है? इसका जवाब आपको हैरान कर देगा।

जिन सालों में विदेशी पैसा भारत से बाहर गया, उन्हीं सालों में घरेलू निवेशकों यानी DIIs (Domestic Institutional Investors) और retail निवेशकों ने लाखों करोड़ रुपये का निवेश किया।

यह पैसा तीन शक्तिशाली sources से आ रहा है:

  1. SIP (Systematic Investment Plans): हर महीने ₹28,000 करोड़ से ज़्यादा का flow एक अनुशासित आदत की तरह बाज़ार में आ रहा है। भारतीय अब अपनी सुबह की चाय से पहले invest कर रहे हैं।
  2. घरेलू बचत (Households): आम भारतीय परिवार अब अपनी बचत को FD, सोना और real estate से निकालकर शेयरों में लगा रहे हैं।
  3. Mutual Funds और Insurance कंपनियां: यह capital स्थिर और लंबी अवधि की है, जो बाज़ार की छोटी-मोटी घबराहट से प्रभावित नहीं होती।

यह कोई “hot money” नहीं है। यह घर में उपजा विश्वास है।

भारतीय बाज़ार में घरेलू और विदेशी निवेश का प्रवाह दिखाता चार्ट

आधुनिक financial history में पहली बार, भारत के शेयर बाज़ार पर विदेशियों से ज़्यादा भारतीयों का ownership है। अब कीमतों, गति और भावना को New York के hedge fund या London के analyst नहीं, बल्कि घरेलू बचत तय कर रही है।

लेकिन विदेशी निवेशक भाग क्यों रहे हैं?

इसकी कुछ ठोस वजहें हैं। भारत उनके लिए “too hot to handle” हो गया है:

  • Valuations: भारतीय बाज़ार का valuation काफी महंगा हो गया है।
  • Capital का Rotation: Global funds भारत से पैसा निकालकर चीन जैसे सस्ते बाज़ारों में लगा रहे हैं।
  • अमेरिकी Bond Yield: अमेरिका में बढ़ती ब्याज दरें जोखिम भरे बाज़ारों को कम आकर्षक बनाती हैं।
  • Mainstream Market: भारत अब कोई छिपा हुआ “underdog” नहीं रहा; यह एक मुख्यधारा का बाज़ार है, इसलिए funds अपना exposure कम कर रहे हैं।

वे वापस आएंगे, लेकिन शायद अभी नहीं।

इस बदलाव के गहरे मायने क्या हैं?

यह आत्मनिर्भरता भारतीय बाज़ार के लिए बहुत महत्वपूर्ण है:

  • Global झटकों से सुरक्षा: भारत अब वैश्विक झटकों के प्रति अधिक मज़बूत है।
  • Stability: विदेशी outflow अब बाज़ार में बड़ी गिरावट का कारण नहीं बनते।
  • स्थानीय सहारा: घरेलू liquidity एक स्थायी cushion प्रदान करती है।
  • Ownership की भावना: भारतीय निवेशक अब बाज़ार में पर्यटक नहीं, बल्कि “घर के मालिक” हैं।

यह सब मिलकर भारत के बाज़ार को Anti-Fragile बनाता है। एक ऐसा system जो न केवल बढ़ने के लिए, बल्कि टिके रहने के लिए बना है।

आगे क्या? कुछ जोखिम और अवसर

हालांकि, तस्वीर पूरी तरह गुलाबी नहीं है। कुछ risk भी हैं। अगर नौकरियों में कमी या आर्थिक तनाव के कारण SIP का flow धीमा हो जाता है, तो यह घरेलू cushion कमजोर हो सकता है। और विदेशियों की गैर-मौजूदगी में, बाज़ार में corrections ज़्यादा तेज हो सकते हैं।

लेकिन एक और पहलू भी है: जब global funds वापस लौटेंगे—और वे हमेशा लौटते हैं—तो वे एक मज़बूत और re-rated भारत में लौटेंगे। उस समय घरेलू और विदेशी, दोनों तरह के निवेश की ताकत बाज़ार को एक नई उड़ान दे सकती है।

यह दशकों में पहली बार है कि विदेशी निवेशक अपना विश्वास खो रहे हैं, जबकि भारतीय परिवार इसे हासिल कर रहे हैं। एक डर से बेच रहा है, दूसरा विश्वास से खरीद रहा है। आप ही बताइए, इस मुकाबले में कौन जीतेगा?

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